Saturday, October 8, 2005

ज़िंदगी

तुम थे पर
अब नही हो !

दिल पर लिखा मैंने
नाम तुम्हारा,
जो गुम गया
वक्त की लहरों में !
अब ढूँढती हूँ तुम्हे,
इन खाली हाथों की
लकीरों मैं!

मेरी ज़िंदगी
जैसे समुंदर किनारे
की रेत हो !
कुछ लिक्ति हूँ पर ॥
कुछ हi पलों में
मिट जाता है
नाम -ओ -निशाँ !


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